(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 13 अनुशासनपर्व


॥ श्रीः ॥
13.81. अध्यायः 081
अथ दानधर्मपर्व ॥ 1 ॥
Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Topics
भीष्मेण युधिष्ठिरम्प्रति स्त्रीणां प्रशंसनम्॥ 1 ॥


Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच।

प्राचेतसस्य वचनं कीर्तयन्ति पुराविदः।
यस्याः किञ्चिन्नाददते ज्ञातयो न स विक्रयः॥ 13-81-1(84645)
अर्हणं तत्कुमारीणामानृशंस्यं व्रतं च तत्।
सर्वं च प्रतिदेयं स्यात्कन्यायै तदशेषतः॥ 13-81-2(84646)
पितृभिर्भ्रातृभिश्चापि श्वशुरैरथ देवरैः।
पूज्या लालयितव्याश्च बहुकल्याणमीप्सुभिः॥ 13-81-3(84647)
यदि वै स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रमोदयेत्।
अप्रमोदात्पुनः पुंसः प्रजनो न प्रवर्धते॥ 13-81-4(84648)
पूज्या लालयितव्याश्च स्त्रियो नित्यं जनाधिप।
स्त्रियो यत्र च पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः॥ 13-81-5(84649)
अपूजिताश्च यत्रैताः सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।
तदा चैतत्कुलं नास्ति यदा शोचन्ति जामयः॥ 13-81-6(84650)
जामीशप्तानि गेहानि निकृत्तानीव कृत्यया।
नैव भान्ति न वर्धन्ते श्रिया हीनानि पार्थिव॥ 13-81-7(84651)
स्त्रियः पुंसां परिददौ मनुर्जिगमिषुर्दिवम्।
अबलाः स्वल्पकौपीनाः सुहृद सत्यजिष्णवः॥ 13-81-8(84652)
ईर्षवो मानकामाश्च चण्डाश्च सुहृदोऽबुधाः।
स्त्रियस्तु मानमर्हन्ति ता मानयत मानवाः॥ 13-81-9(84653)
स्त्रीप्रत्ययो हि वै धर्मो रतिभोगाश्च केवलाः।
परिचर्या नमस्कारास्तदायत्ता भवन्तु वः॥ 13-81-10(84654)
उत्पादनमपत्यस्य जातस्य परिपालनम्।
प्रीत्यर्थं लोकयात्रायाः पश्यत स्त्रीनिबन्धनम्॥ 13-81-11(84655)
सम्मान्यमानाश्चैता हि सर्वकार्याष्यवाप्स्यथ।
विदेहराजदुहिता चात्र श्लोकमगायत॥ 13-81-12(84656)
नास्ति यज्ञः स्त्रियाः कश्चिन्न श्राद्धं नोप्रवासकम्।
धर्मः स्वभर्तृशुश्रूषा तया स्वर्गं जयन्त्युत॥ 13-81-13(84657)
पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
पुत्राश्च स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥ 13-81-14(84658)
श्रिय एताः स्त्रियो नाम सत्कार्या भूतिमिच्छता।
लालिताऽनुगृहीता च श्रीः स्त्री भवति भारतः॥ ॥ 13-81-15(84659)

इति श्रीमन्महाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि एकाशीतितमोऽध्यायः॥ 81 ॥

Mahabharata - Anushaasana Parva - Chapter Footnotes

7-81-1 प्राचेतसस्य दक्षस्य। ज्ञातयः कन्यापक्षीयाः। स्वयं नाददतेऽथ च कन्यालङ्कारर्थमिच्छन्ति स विक्रयो न भवतीत्यर्थ॥ 7-81-4 न रोचेत न कामयेत। न प्रमोदयेत्कामुकं न कुर्यात्। प्रजनः सन्ततिः॥ 7-81-8 स्वल्प ईषदायासेन अपनेयः कौपीनो गुह्याच्छादनपटो यासाम्। सद्योहार्या इत्यर्थः। सुहृदः सौहार्दयुक्ताः॥ 7-81-9 बुध्यन्त इत्यबुधाः॥ 7-81-10 स्त्रीप्रत्ययः स्त्रीहेतुकः॥ 7-81-12 अत्र स्त्रीधर्मविषये॥


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